Major diseases of mustard and their prevention measures
राजस्थान मे सरसों रबी season की प्रमुख oilseed crop है। यह फसल कम लागत और कम सिंचाई सुविधा में भी अन्य फसलों की तुलना में अधिक benefit देती है, फिलहाल अब एक क्विंटल सरसों का rate 6 हजार रुपये पहुँच चुका है, जो इसकी खासियत है| मगर अधिक उत्पादन लेने के लिए कीट और बीमारियों पर काबू या नियंत्रण रखना पड़ता है| सरसों की फसल कई प्रकार के कीटों व रोगों से ग्रसित हो सकती है, जैसे हानिकारक कीटों की बात करें तो माहू (Aphid), आरा मक्खी (Saw fly), पेंटेड बग, लीफ माइनर मुख्य है| सरसों के रोगों में झुलसा (Blight), सफेद रोली (White rust), मृदुरोमिल आसिता (Downey mildew), चूर्णित आसिता (Powdery mildew) एवं तना गलन (Stem rot) आदि प्रमुख है| जिसके कारण उपज में अत्यधिक कमी आती है तथा बीजों में तेल की मात्रा भी घट जाती है जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान होता है।
अतः सरसों में लगने वाले प्रमुख रोगों से पहचान और बचाव के उपाय इस प्रकार हैः-
सफेद रोली (White rust)
यह रोग Albugo candida नाम की fungus से पैदा होता है। यह बीज और मिट्टी जनित रोग है| इस रोग के रोगाणु लंबे समय तक फसल अवशेषों, खरपतवारों व बीजों के साथ जमीन में रहते रहते हैं। 5-12 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान और 75 प्रतिशत से अधिक वातावरण में नमी होने पर और बादल होने पर यह रोग अत्यधिक फैलता है। इस रोग के लक्षण नवंबर में जब तापमान 20 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है|
बुवाई के 30-40 दिनों बाद इसके लक्षण पत्तियों के निचली सतह पर सफेद या पीले रंग के छोटे छोटे फफोले के रूप में दिखाई देते है| अधिक रोग बढ़ने के साथ-साथ ये फफोले आपस में मिलकर अनियमित आकार का रूप बना लेते हैं और बाद में पूर्ण विकसित होजाने पर फफोले फट जाते है| तने व फलियों पर भी सफेद फफोले दिखाई देते हैं| पुष्पीय भाग एवं फलिया विकृत हो जाती है तथा इसमें दाने नहीं बनते है| जड़ों को छोड़कर पौधे के अन्य सभी भागों पर इस रोग के लक्षण दिखाई देते हैं। तने में सूजन हो जाने के कारण पौधा झुक जाता है।
सफेद रोली रोग से बचाव और रोकथाम के उपाय (Measures to prevent white rust disease)
अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा या झुलसा रोग: (Alternaria leaf spot/ blight)
यह रोग अल्टरनेरिया ब्रेसिकी नाम की फफूंद से होता है। इस रोग के रोगाणु पादप अवशेष तथा खरपतवार पर जीवित रहते है। 18 से 20 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान और 80 प्रतिशत से अधिक नमी होने पर रोग उग्र हो जाता है| बार-बार वर्षा या अधिक सिंचाई से रोग का प्रकोप बढ़ने लगता है| लक्षण सबसे पहले निचली और पुरानी पत्तियों पर बुवाई के 40-45 दिन बाद दिखाई देने लगते है| निचली सतह पर भूरे धब्बे के रूप में देखाई देते है| उसके बाद ये धब्बे काले गोल targeted board जैसी structure के हो जाते है और इसके चारों तरफ पीला आवरण बन जाता है| बाद की अवस्था में ये धब्बे जल जाते है, जिससे पत्तियां झुलसी हुई नजर आती है| ये पत्तियां सिकुड़कर व सुखकर गिर जाती है| धीरे-धीरे ये गहरे भूरे रंग के धब्बे तना, टहनी और फलियों पर फैल जाते हैं। इसके प्रभाव से पौधों पर फूल कम लगते हैं और फलीयों में दाने सिकुड़ जाते है, जिससे उपज में और तेल की मात्रा में कमी आ जाती है|
अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग से बचाव और रोकथाम के उपाय (Measures to prevent Alternaria leaf spot/ blight disease)
तना गलन रोग (Stem rot Disease)
यह रोग स्कलेरोटिनिया स्कलेरोटियोरम नामक की फफूंद से होता है। रोग फसल पर फूल आने के बाद ही दिखाई देता है | जमीन की ऊपरी सतह में अधिक नमी व वातावरण में ठंडक इस रोग को पनपने व फैलाने में सहायक होते हैं। रोग का कम प्रकोप होने पर समय से पहले पौधे पक जाते है, रोग्रस्त पौधे खेत में अलग ही दिखाई देते हैं।
इस रोग के लक्षण फसल बोने के 60 से 65 दिन बाद और फूल खिलने के बाद दिखाई देते है| रोग के शुरुआती लक्षण पौधे के तने और जमीन की सतह से थोड़ा उपर बड़े-बड़े सफेद लम्बे चकतों के रूप में दिखाई देते है| ये रूई जैसी सफेद फफूंद से ढके होते हैं या फफूंद का जाल बन जाता है| रोग की अधिकता ये fungus पूरे तने को ग्रसित कर देती है। रोगग्रस्त मृत तने को चीरकर देखा जाये तो उसमें बहुत सारे काले रंग के गोल या अनियमित आकार की छोटी-छोटी कठोर संरचनाएँ जिसे स्कलेरोशिया कहते है, दिखाई देती हैं। ऐसी अवस्था में पौधे मुरझाकर सूखने लग जाते हैं। रोगग्रस्त पौधों के तने भुरभुरे से होते हैं और बिखर कर टूट जाते है| फसल कटाई पर ये बीजाणु येस्केलेरोशिया जमीन पर गिर जाते हैं या बीज के साथ मिल जाते हैं और अगले season फिर से रोग प्रकट होने का कारण बनते है| इसलिए प्रमाणित संस्था से ही बीज खरीदना चाहिए|
तना गलन रोग से बचाव और रोकथाम के उपाय (Preventive measures of Stem Rot Disease)
मृदुरोमिल आसिता या तुलासिता रोग (Downy mildew disease)
सबसे पहले नई पत्तियों में नीचे की तरफ cotton की तरह सफेद भूरी फफूंद दिखाई देती है, जिससे हल्के भूरे-बैगनी धब्बे बन जाते है और इसके ठीक ऊपर पीले मटमेले और अनियमित आकार के धब्बे दिखाई देते है|
मृदुरोमिल आसिता से बचाव और रोकथाम के उपाय (Preventive measures of Downy mildew Disease)
बीज को मेटालेक्सल 35% DS @ 6 ग्राम या ट्राइकोडर्मा विरिडी से 10 ग्राम प्रति किलो से treatment करना चाहिए| लक्षण दिखाई देने पर मेंकोजेब 75% WP @ 500 ग्राम या मेटालेक्सल 4% + मेंकोजेब 64% WP @ 600 ग्राम या मेटालेक्सल 8% + मेंकोजेब 64% WP @ 500 ग्राम प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव कर दे| अवश्यकता होने पर 15 दिनों बाद दोबारा spray दोहराए|
छाछिया या पाउडरी मिलड्यू (Powdery mildew)
सबसे पहले पुरानी पत्तियों में ऊपरी सतहों पर सफेद रंग के चकते दिखाई देते है, जो तेजी से पूरी पत्तियों व डालियों पर फैल जाते है और पौधा प्रकाश संश्लेषण नहीं कर पाता और भोजन भी नहीं बना पता| बाद में पत्तियाँ पीली पड़ कर झड़ जाती है| अधिक प्रकोप होने पर खेत ऐसा दिखाई देता है मानों किसी ने फसल पर आटा बिखेर दिया है| इसलिए ही इस रोग का नाम छछिया या पाउडरी मिलड्यू पड़ा है|
छाछिया या पाउडरी मिलड्यू (Preventive measures of Powdery mildew Disease)
लक्षण दिखाई देने पर सल्फर 80% WDG की 800 ग्राम मात्रा या एजोक्सीस्ट्रोबीन 23% SC की 200 मिली मात्रा या फ्लुसिलाजोल 40% EC की 60 ग्राम या माइकोबुटानिल 10% WP की 40 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ के हिसाब से 200 लीटर पानी में मिलाकर spray कर दे| अन्य कवकनाशी जैसे CARBENDAZIM 50 WP, HEXACONAZOLE 5 SC, THIOPHANATE METHYL 70 WP, DIFENOCONAZOLE 25 EC का भी प्रयोग रोग की रोकथाम के लिए किया जा सकता है|
आप का कोई भी सुझाव या जानकारी सह्रदय आमंत्रित है, comment करके जरूर बताए धन्यवाद🙏